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पत्नी ने आपके खिलाफ कई मुकदमे कर दिए हैं? घबराइए नहीं — कानूनी रास्ते समझिए
पत्नी ने आपके खिलाफ कई मुकदमे कर दिए हैं? घबराइए नहीं — कानूनी रास्ते समझिए अगर आप पति हैं और आपकी पत्नी ने आपके तथा आपके परिवार के सदस्यों के खिलाफ एक नहीं, बल्कि कई आपराधिक मुकदमे दर्ज करा दिए हैं, तो सबसे पहले घबराइए नहीं।
CRIMINAL LAWSMATRIMONIAL
Vikrant Pratap Singh Advocate
9/28/20261 min read
पत्नी ने आपके खिलाफ कई मुकदमे कर दिए हैं? घबराइए नहीं — कानूनी रास्ते समझिए
अगर आप पति हैं और आपकी पत्नी ने आपके तथा आपके परिवार के सदस्यों के खिलाफ एक नहीं, बल्कि कई आपराधिक मुकदमे दर्ज करा दिए हैं, तो सबसे पहले घबराइए नहीं।
पत्नी ने आपके खिलाफ कई मुकदमे कर दिए हैं? घबराइए नहीं — कानूनी रास्ते समझिए
अगर आप पति हैं और आपकी पत्नी ने आपके तथा आपके परिवार के सदस्यों के खिलाफ एक नहीं, बल्कि कई आपराधिक मुकदमे दर्ज करा दिए हैं, तो सबसे पहले घबराइए नहीं।
कानून में आपके पास अपनी रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय उपलब्ध हैं।
सबसे पहले यह समझिए कि F.I.R. दर्ज हो जाना ही दोष सिद्ध हो जाना नहीं है। F.I.R. केवल आपराधिक कानून की प्रक्रिया की शुरुआत है। यदि F.I.R. में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया किसी अपराध का गठन नहीं करते, आरोप अत्यंत अस्पष्ट या असंभव हैं, अथवा पूरी कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण तरीके से आपको परेशान करने के उद्देश्य से शुरू की गई है, तो उचित मामले में आप माननीय उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं और F.I.R. अथवा आगे की कार्यवाही को निरस्त करने की मांग कर सकते हैं।
अब बात करते हैं गिरफ्तारी की।
सर्वोच्च न्यायालय ने Satender Kumar Antil बनाम Central Bureau of Investigation के महत्वपूर्ण निर्णय में गिरफ्तारी के संबंध में वैधानिक सुरक्षा उपायों और गिरफ्तारी की आवश्यकता पर जोर दिया है।
इसलिए केवल ऐसी F.I.R. दर्ज हो जाने से, जिसमें अपराध की अधिकतम सजा सात वर्ष तक है, यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी की गिरफ्तारी अनिवार्य रूप से होगी।
लेकिन ध्यान रखिए—इसका यह अर्थ भी नहीं है कि सात वर्ष तक की सजा वाले किसी भी अपराध में पुलिस कभी गिरफ्तारी नहीं कर सकती। गिरफ्तारी की आवश्यकता कानून में निर्धारित परिस्थितियों और मामले के तथ्यों के आधार पर तय होती है।
अब मान लीजिए कि पुलिस ने विवेचना पूरी करके चार्जशीट दाखिल कर दी और मजिस्ट्रेट ने उसका संज्ञान भी ले लिया।
तो क्या अब आपके पास कोई रास्ता नहीं बचा?
बिल्कुल ऐसा नहीं है।
उचित मामले में आप फिर से माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष जा सकते हैं। यदि चार्जशीट और विवेचना के दौरान एकत्र की गई सामग्री से अपराध बनता ही नहीं है, अथवा कार्यवाही जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, तो उच्च न्यायालय अपनी अंतर्निहित अधिकारिता का प्रयोग करते हुए आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर सकता है।
अब एक और महत्वपूर्ण बात।
कई वैवाहिक विवादों में न्यायालय पक्षकारों को मध्यस्थता यानी Mediation के लिए भेज सकता है।
यदि पति-पत्नी अपने विवाद को आपसी सहमति से समाप्त करना चाहते हैं, तो मध्यस्थता एक अच्छा रास्ता हो सकता है। कई मामलों में पक्षकार आपसी सहमति से कुछ शर्तों पर समझौता करते हैं और उसके बाद न्यायालय के समक्ष कार्यवाही समाप्त करने की मांग की जाती है।
लेकिन यह भी याद रखिए—मध्यस्थता में पैसा देना कोई अनिवार्य कानूनी नियम नहीं है। यदि पक्षकार आपसी सहमति से किसी धनराशि या अन्य शर्त पर समझौता करते हैं, तो वह समझौते की शर्त होती है।
और यदि मध्यस्थता सफल नहीं होती, तब भी मामला समाप्त नहीं हो जाता। ऐसी स्थिति में न्यायालय मामले के गुण-दोष पर विचार कर सकता है और यह तय कर सकता है कि आपराधिक कार्यवाही जारी रहनी चाहिए या कानून के अनुसार उसे निरस्त किया जाना चाहिए।
इसलिए अगर आपकी पत्नी ने आपके और आपके परिवार के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज करा दिए हैं, तो डरने या घबराने के बजाय अपनी F.I.R., चार्जशीट और केस की वर्तमान स्थिति को किसी योग्य अधिवक्ता से तुरंत दिखाइए।
याद रखिए—
F.I.R. अंत नहीं है।
चार्जशीट अंत नहीं है।
संज्ञान लिया जाना भी अंत नहीं है।
कानून में हर चरण पर उचित कानूनी उपचार उपलब्ध हो सकता है।
अपने अधिकारों को जानिए, कानून को समझिए और भावनाओं में नहीं, बल्कि कानूनी रणनीति के साथ आगे बढ़िए।
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